(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.13. अध्यायः 013
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
युधिष्ठिरंप्रति सहदेववचनम्॥ 1॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

सहदेव उवाच। 12-13-0x(5708)(69886)
न बाह्यं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति भारत।
शारीरं द्रव्यमुत्सृज्य सिद्धिर्भवति वा न वा॥ 12-13-1(69887)
बाह्यद्रव्यविमुक्तस्य शारीरेष्वनुगृध्यतः।
यो धर्मो यत्सुखं वा स्याद्द्विषतां तत्तथाऽस्तु नः॥ 12-13-2(69888)
शारीरंद्रव्यमुत्सृज्य पृथिवीमनुशासतः।
यो धर्मो यत्सुखं वा स्यात्सुहृदां तत्तथाऽस्तु नः॥ 12-13-3(69889)
द्व्यक्षरस्तु भवेन्मृत्युरुयक्षरं ब्रह्म शाश्वतम्।
ममेति द्व्यक्षरो मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम्॥ 12-13-4(69890)
ब्रह्ममृत्यू ततो राजन्नात्मन्येव समाश्रितौ।
अदृश्यमानौ भूतानि योजयेतामसंशयम्॥ 12-13-5(69891)
अविनाशोऽस्य सत्वस्य नियतो यदि भारत।
हित्वा शरीरं भूतानां न हिंसा प्रतिपत्स्यते॥ 12-13-6(69892)
अथापि च सहोत्पत्तिः सत्वस्य प्रलयस्तथा।
नष्टे शरीरे नष्टः स्याद्वृथा च स्यात्क्रियापथः॥ 12-13-7(69893)
तस्मादेकान्तमुत्सृज्य पूर्वैः पूर्वतरैश्च यः।
पन्था निषेवितः सद्भिः स निषेव्यो विजानता॥ 12-13-8(69894)
`स्वायंभुवेन मनुना तथाऽन्यैश्तक्रवर्तिभिः।
यद्ययं ह्यधमः पन्थाः कस्मात्तैस्तैर्निषेवितः॥ 12-13-9(69895)
कृतत्रेतादियुक्तानि गुणवन्ति च भारत।
युगानि बहुशस्तैश्च भुक्तेयमवनी नृप॥' 12-13-10(69896)
लब्ध्वाऽपि पृथिवीं कृत्स्नां सहस्थावरजङ्गमाम्।
न भुङ्क्ते यो नृपः सम्यक्किंफलं तस्य जीविते॥ 12-13-11(69897)
अथवा वसतो राजन्वने वन्येन जीवतः।
द्रव्येषु यस्य ममता मृत्योरास्ये स वर्तते॥ 12-13-12(69898)
बाह्यान्तराणां भूतानां स्वभावं पश्य भारत।
ये तु पश्यन्ति तद्भूतं मुच्यन्ते ते महाभयात्॥ 12-13-13(69899)
भवान्पिता भवान्माता भवान्भ्राता भवान्गुरुः।
दुःखप्रलापानार्तस्य तन्मे त्वं क्षन्तुमर्हसि॥ 12-13-14(69900)
तथ्यं वा यदि वाऽतथ्यं यन्मयैतत्प्रभाषितम्।
तद्विद्वि पृथिवीपाल भक्त्या भरतसत्तम॥ ॥ 12-13-15(69901)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि राजधर्मपर्वणि त्रयोदशोऽध्यायः॥ 13॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-13-2 सुहृदां तत्तथास्तु न इति ड.थ. पाठः॥ 12-13-4 ममेति स्वीकारः नममेति परित्यागश्च एतौ मृत्युशाश्वतौ संसारमोक्षयोर्मूले इत्यर्थः॥ 12-13-7 सत्वस्य कर्तृत्वधर्मवत्या बुद्धेः॥


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